Jijivisha

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जिजीविषा: शून्य, संत और अनंत एक गहन भावनात्मक, दार्शनिक और आध्यात्मिक हिंदी काव्य-संग्रह है, जो जीवन के संघर्षों, प्रेम, मृत्यु, अकेलेपन, आत्मा और अस्तित्व के अनगिनत प्रश्नों को शब्दों में पिरोता है।

  • By: Hansraj (RevRaaj) barawal
  • ISBN: 9789378211720
  • Price: 449/-
  • Page: 296
  • Size: 5×8
  • Category: Poetry Indian Poetry/Poetry Inspirational & Religious/Literature & Fiction Poetry/Philosophy Spirituality
  • Language: Hindi
  • Delivery Time: 07-09 Days
SKU: BookAP1001P-222 Categories: , , , Tags: ,
ISBN
9789378211720
Publisher
Ananta Press
Language
Hindi
Pages
296
Binding / format
Paperback
Book size
5x8
Publication date
30/10/2026

Description

About The Book

जिजीविषा: शून्य, संत और अनंत एक गहन भावनात्मक, दार्शनिक और आध्यात्मिक हिंदी काव्य-संग्रह है, जो जीवन के संघर्षों, प्रेम, मृत्यु, अकेलेपन, आत्मा और अस्तित्व के अनगिनत प्रश्नों को शब्दों में पिरोता है।
कवि रेवराज की रचनाएँ मानव जीवन के उन पहलुओं को सामने लाती हैं, जिन्हें हम अक्सर महसूस तो करते हैं, लेकिन व्यक्त नहीं कर पाते। इस पुस्तक में जीवन की कठिनाइयों के साथ-साथ आशा, आत्मविश्वास, प्रेम, करुणा और आत्मिक जागृति की अनुभूति भी मिलती है।
इस संग्रह की कविताएँ पाठकों को कभी महाभारत के कुरुक्षेत्र और शिव-तत्व के आध्यात्मिक संसार में ले जाती हैं, तो कभी आधुनिक शहरों के अकेलेपन, रिश्तों की जटिलताओं और मनुष्य के भीतरी संघर्षों से परिचित कराती हैं।
यह पुस्तक केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि स्वयं को समझने, जीवन के अर्थ की खोज करने और कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ते रहने की मानवीय इच्छाशक्ति का काव्यात्मक प्रतिबिंब है।

About The Author

हंसराज बारावाल, जिन्हें उनके मंचीय नाम रेवराज से जाना जाता है, राजस्थान के चौमू, जयपुर से जुड़े एक कलाकार और कवि हैं।
उन्होंने मात्र छठी कक्षा में, लगभग 12 वर्ष की आयु में कविता लिखना शुरू किया। जीवन के शुरुआती अनुभवों ने उन्हें संघर्ष, अकेलेपन, आर्थिक कठिनाइयों और समाज की कई अनकही सच्चाइयों से परिचित कराया।
पिछले सात वर्षों की रचनात्मक यात्रा में कविता उनके लिए केवल लेखन का माध्यम नहीं, बल्कि आत्म-संवाद, प्रश्न और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति रही है।
उनकी रचनाओं में मनुष्य, आत्मा, मृत्यु, प्रेम, अकेलापन, समाज, प्रकृति, संघर्ष और अस्तित्व जैसे विषय प्रमुखता से उभरते हैं।
रेवराज का मानना है कि कला केवल देखने या पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि समाज में परिवर्तन और नई चेतना पैदा करने की शक्ति है। उनका उद्देश्य अपनी कला और लेखनी के माध्यम से सकारात्मक बदलाव और वैचारिक जागृति को प्रेरित करना है।

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