Antardwandv

500.00

अंतर्द्वंद्व एक मार्मिक मनोवैज्ञानिक उपन्यास है

  • By: Dr. Ravendra Kumar Shrivastava
  • ISBN: 9789378210464
  • Price: 500/-
  • Page: 252
  • Size: 6×9
  • Category: एक मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक उपन्यास
  • Language: Hindi
  • Delivery Time: 07-09 Days

Description

About The Book

अंतर्द्वंद्व एक मार्मिक मनोवैज्ञानिक उपन्यास है, जो विजय नामक एक ऐसे व्यक्ति की कहानी कहता है, जो जेल की कोठरी में अपनी फाँसी की प्रतीक्षा करते हुए अपने पूरे जीवन का आत्ममंथन करता है। बचपन के आघात, माँ के मौन, संघर्ष, सफलता, अकेलेपन और अपराधबोध से गुजरते हुए उसका जीवन इस प्रश्न को सामने रखता है कि क्या इंसान का अतीत उसके वर्तमान और भविष्य को तय कर देता है।

यह केवल एक हत्या की कहानी नहीं, बल्कि उस मनुष्य की अंतर्यात्रा है जो जीवन भर प्रेम, अपनापन और शांति की तलाश करता रहा, पर उन्हें पहचान नहीं सका। अंतर्द्वंद्व पाठकों को जीवन की उन भावनात्मक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परतों से रूबरू कराता है, जहाँ हर निर्णय, हर संबंध और हर अनुभव इंसान के व्यक्तित्व को आकार देता है।

About The Author
डॉ रावेंद्र कुमार श्रीवास्तव वाराणसी के निवासी हैं। साहित्य, शिक्षा, विधि और खेल-जगत से उनका गहरा संबंध रहा है। उनकी कई पुस्तक पूर्व में प्रकाशित हो चुकी है, जिससे उनके लेखन-चिंतन और साहित्यिक अभिरुचि का परिचय मिलता है।
श्री श्रीवास्तव ने प्रबंधन विषय में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है। यह उनकी अनुशासित जीवन-दृष्टि, गहन अध्ययनशीलता और शारीरिक-मानसिक संतुलन के प्रति गंभीर समझ को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त उन्होंने विधि अर्थात एल.एल.बी. की पढ़ाई भी की है, जिसके कारण वे एक पेशेवर अधिवक्ता के रूप में भी अपनी पहचान रखते हैं।
उनका व्यक्तित्व विविध अनुभवों से निर्मित है। एक ओर वे शिक्षा और शोध से जुड़े रहे हैं, दूसरी ओर विधि-क्षेत्र ने उन्हें मनुष्य, समाज, न्याय, अपराध और दंड जैसी जटिल मानवीय स्थितियों को निकट से समझने का अवसर दिया है। संभवतः यही कारण है कि उनके लेखन में केवल घटनाएँ नहीं, बल्कि उनके भीतर छिपी मनोवैज्ञानिक परतें भी दिखाई देती हैं।
यह उपन्यास मनुष्य के भीतर चलने वाले मौन संघर्षों, बचपन के घावों, संबंधों की उलझन, अपराधबोध, अकेलेपन और मृत्यु के सामने खड़े व्यक्ति की मानसिक स्थिति को समझने का एक गंभीर प्रयास है। रावेंद्र कुमार श्रीवास्तव अपने लेखन के माध्यम से पाठकों को केवल कथा नहीं सुनाते, बल्कि उन्हें मनुष्य के भीतर उतरकर देखने के लिए प्रेरित करते हैं।

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